Saturday, 25 May 2019

विराम                                                                                                                
नमस्ते दोस्तों  मैं समीरा हूँ , मैं यहाँ आपको अपनी जिंदगी के अनुभवों से कुछ सिखाना चाहती हूँ, मेरी कहानी बहुत ही उदासी और मानसिक मंथन से बनी कहानी है , वैसे ये इतना जरूरी नहीं की मैं अपनी जिंदगी की इतनी व्यक्तिगत बात को सब को बताऊ , पर मुझे लगता है की मेरे ये अनुभव, मेरे उन दोस्तों को काम आएंगे जो इसी तरह के हालात से गुज़र रहे है.
तो मैं अपनी कहानी शुरू करती हूँ, आज से लगभग पच्चीस साल पहले मेरे माता- पिता का विवाह हुआ ,वे दोनों ही एकदूसरे को बहुत प्यार करते थे ,यहाँ तक की  लोग उन्हें made for each other  कहा करते थे।
मेरे पिता एक बड़े बिज़नेस मैन थे ,  वे बड़े ही दयालु और सभ्य व्यक्ति थे , उनके चेहरे पर सदैव एक मधुर  मुस्कान रहा करती थी , जो किसी को भी सहज अपनी तरफ खींच सकती थी.
दूसरी तरफ मेरी माँ पूरी  तरह से विपरीत थी ,वे बहुत ही दबंग और खुले दिल की स्त्री थी , वो किसी को सहज ही इज़्ज़त नहीं देती थी , आपसी बोलचाल में भी असभ्य और रूखे शब्दों का इस्तेमाल करती थी ,जहा मेरे पिता मुस्कुरा कर काम चला लेते , वहाँ वे  बिलकुल ही उलटी तौर पर  ज़ोर -ज़ोर से ठहाके लगा कर हॅसनेवाली और तरह -तरह के सकैण्डल  मैं  घिरी रहनेवाली महिला थी।
उन दोनों के बीच सिर्फ एक चीज़ थी जो समान थी , वह  थी मैं उन दोनों  की एकलौती संतान , वह दोनों ही मुझे बहुत प्यार करते और मैं भी उन दोनों को बहुत प्यार करती थी , लेकिन मेरा भी सभी सामान्य बच्चो की तरह माँ से कुछ ज्यादा ही जुड़ाव था  ,क्यूंकि जब भी कोई मेरे से यह बचकाना प्रश्न  जिसे हर बच्चे से पूछा जाता है की मैं किसे ज्यादा प्यार करती हूँ ? मैं बिना एक पल भी गवाए और कुछ भी सोचे बिना गर्व से कहती मां !.पर इसका मतलब ये बिलकुल नहीं था की मैं अपने पिता के करीब नहीं थी।
मेरे 15 वे जन्मदिन के समय मैं बहुत ही खुश थी, सब कुछ बिलकुल सामान्य सा ही था की, मेरे मेरे माता -पिता ने मुझे बात करने के लिए बुलाया , और कहा की वह मुझसे कोई जरुरी बात करना चाहते है , मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा और मैं खुद को बहुत कमज़ोर महसूस करने लगी , मेरे मन में अनजानी सैकड़ो शंकाये आने लगी, पसीना भी आने लगा, पर मेरे माता पिता का ज़रा सा  ध्यान भी मेरी तरफ नहीं था , मुझे वो दोनों ही बहुत अजनबी से लग रहे थे की ,तभी मैंने वो सुना जिसका मुझे डर था, और जो  किसी भी बच्चे के लिए असहनीय है
उन्होंने कहा:" सुनो बेटी हम दोनों ने निर्णय लिया है की हम दोनों अब अलग हो जाए , अब तुम भी बड़ी हो चुकी हो और अपना भला बुरा समझ के अपने फैसले ले सकती हो ,हमे पूरा विश्वास है की तुम समझ सकोगी ,
मेरे हाथ पैर काँप रहे थे मेरा दिमाग सुन्न हो गया था और तेज़ पसीना आ रहा था पर ,मैंने समझदार होने का नाटक करते हुए अपने सर को हिला दिया , और उन दोनों से ये प्रश्न भी नहीं पूछा की उनको मुझसे मेरे माँ बाप को अलग करने का ये अधिकार किसने दिया , मैं सोचने लगी की इतने दिनों तक हम सब एक दूसरे के साथ ही थे फिर भी मैं कैसे नहीं समझ पायी की मेरा परिवार इस तरह टूटने की कगार पर खड़ा है ,अचानक ही घर की खुशियों का इंद्रधनुष खतरनाक तूफान में बदल गया। घर की हंसी की जगह ख़ामोशी और षडयंत्रो ने ले ली।
तलाक़ की प्रक्रिया न्याय के अनुसार ही हुयी माँ पापा बिना किसी लड़ाई झगड़े के चुप चाप अलग हो गए सब कुछ बराबर बराबर बाँट दिया गया ,पर जो नहीं बंट पाया ,वो थी मैं जिसे उन दोनों में से कोई भी छोड़ना नहीं चाहता था , माँ पापा दोनों ही मुझे खुश रखने की कोशिशों में लग गए ताकि मैं उनकी तरफ आने का मन बना लू ,जो मुझे मेरे पहले माँ पापा जैसा नहीं लगता था ,ऐसा लगता उनका प्यार और उपहार सिर्फ मुझे साथ रखने के लिए लुभाने की कोशिशे है ,
 मेरी इस दुविधा को देख मेरे दादा दादी ने कहा “प्यारी समीरा तुम एक समझदार लड़की हो और बड़ी भी तुम माँ पा के बीच किसी एक को चुन लो और ख़ुशी से रहो। “
मेरा मन मुझसे कहने लगा की मैं ज़ोर ज़ोर से चिल्लाऊं और  पुछु :
“माँ पापा मैं कोई चीज़ नहीं आपकी अपनी वही समीरा हूँ ,एक जीती जगती बच्ची ,अपने मुझसे एक बार पूछा तो होता भला आप दोनों मेसे एक मैं कैसे चुन सकुंगी ,,क्या सच मच मैं इतनी बड़ी हूँ की मैं माँ या पापा के बीच किसी एक को चुन सकती हूँ ,”
हमारा घर एक नर्क में बदल चूका था जहा हम अब भी साथ ही रहते थे मैंने देखा ,मेरी माँ मुझे साथ रखने के लिए कुछ भी करने को तैयार है ,माँ मुझे तरह -तरह के महंगे उपहार  खरीद कर देती ,मुझे बहुत ही अजीब लगता की जो माँ मुझे हर चीज़ से रोकती और अच्छा बुरा समझती रहती ,आज बस मुझे आकर्षित करने के लिए माँ मुझे अपने साथ ब्यूटी स्पा ,रेस्टोरंट पब सब जगह साथ ले जाती और मेरे साथ माँ नहीं बल्कि बेस्ट फ्रेंड होने की एक्टिंग करती ,मेरी माँ कही खो गयी थी , मुझे अच्छा नहीं लगता ,मगर फिर भी मैं कुछ नहीं बोलती पर ,जो बात मुझे बिलकुल पसंद नहीं थी वह यह की, वो हर समय कहती मेरे पापा एक अच्छे इंसान नहीं है,मैं अपने पापा को बहुत प्यार करती हूँ ,मेरी माँ ही बार बार मुझे मेरे पिता के बुरे होने की खबर देती ,
दूसरी तरफ मेरे पिता कुछ भी नहीं कहते वो हमेशा  मेरी तरफ प्राथ्नापूर्ण नज़रो से देखते रहते और बहुत अकेले नज़र आते ,और मुझे अपने पिता का ये प्यार और बेबसी भी एक्टिंग सी लगने लगी थी ।
एक दिन मैंने उन दोनों को बात करते हुए सुना  मेरी माँ मेरे पिता को बड़े ही कड़े शब्दों में धमकी दे रही थी और ब्लैकमेल कर रही थी उन्होंने पिता जी से कहा " तुम समीरा को स्वतंर छोड़ दो तो मैं कोर्ट की इजाजत  से कभी -कभी तुम्हे  समीरा को देखने दूंगी वरना  सारी  उम्र तुम उसे नहीं  देख पाओगे ,मैं तुम्हारे ऊपर हिंसक होने का आरोप लगा दूंगी और तुम्हारे ऊपर एक खराब हिंसक और बुरे आदमी होने का आरोप लगवा दूगी और लीगली भी  उसको कभी  देखने  नहीं दूंगी , वैसे भी तुम जानते हो वो सिर्फ मुझे ही चुनेगीं।"
मेरे पापा बहुत उदास हो गए और कुछ नहीं बोले उन्होंने सर हिला दिया वह कैसे भी सिर्फ मुझे देखना चाहते थे, माँ का ये रूप देख कर मुझे बड़ा  बहुत दुःख हुआ और मैं बहुत रोई और मैंने उसी समय अपना निर्णय भी ले लिया। अगले दिन कोर्ट में जब माँ पुरे विश्वास से मुझे लेने आयी ,मैंने कोर्ट में कहा की, मैं सिर्फ अपने पिता के साथ रहना चाहती हूँ.
 मेरी माँ के  चेहरे का  दुःख और अपमान से  रंग उड़ गया  और वो मेरी तरफ घृणा से देखने लगी ,मेरे पापा की ख़ुशी और आश्चर्य  का कोई ठिकाना ही ना था ,वो सबको धन्यवाद दे कर ख़ुशी से रो पड़े।
अब  माँ ने हमारा घर छोड़ दिया था और मैं पापा के साथ रहने लगी , मेरे मन में माँ के बारे में बहुत बुरे- बुरे ख्याल आते ,और उनकी मेरे पिता से कही गयी बाते भी हमेशा दिमाग मैं घूमती,  मैं अपनी माँ से ,दिल से  दूर होती जा रही थी, वो मुझे किसी खतरनाक विलेन की तरह नज़र आती , माँ मुझसे कभी -कभी मिलने आती थी और हमेशा  मुझे जताती की मैं कितनी बड़ी स्वार्थी  और दगाबाज़ हूँ , मुझे समझ नहीं आता की उन्हें कैसे समझाऊ की मैं नहीं वही ऐसी हैं पर मैं  चुप रहती ,दूसरी तरफ मेरे पापा बहुत खुश है, हमेशा मेरी इच्छा  का ध्यान रखते है मुझे समय देते है अच्छे बुरे का ज्ञान देते  है मेरे लिए गिफ्ट लाते है, और सब से बड़ी बात उन्होंने  मुझे ढेर सा फ्रीडम भी दिया जो किसी भी पंद्रह साल की लड़की को मिलना संभव नहीं है।
पर एक बार मैंने ,इस फ्रीडम को दुरूपयोग करने का सोचा और पापा से कहा की   एक ओवर नाईट म्यूजिक पार्टी  है ,जिसमे मैं अपने मित्रो के साथ पूरी रात बाहर बिताना चाहती हूँ ,  पर मेरे पापा नहीं माने  ,मैं बहुत  चीखी ,चिल्लाई और जब कोई नतीजा  नहीं निकला तो मैंने वो किया जो मैं  सोच भी नहीं सकती थी , मैंने पहली बार अपने  पापा को ब्लैक मेल किया , और मैं बोली की अगर आपने मुझे परमिशन नहीं दी, तो मैं तुरंत माँ को फ़ोन कर माँ के पास  चली जाउंगी, पापा के फेस पर फिर मायूसी  के भाव आ गए, और वो बोले ठीक है , तुम जाओ ,जो ठीक लगे करो, और चुप चाप मेरे कमरे से चले गए।
और मैं सोचने लगी की मैंने, उनको कितना बड़ा शॉक दिया है, मैंने अपने डैड को ब्लैकमेल किया था, और मुझे बहुत शर्मिंदगी लग रही थी, जिस तरह मेरी माँ ने उस शाम पापा को ब्लैकमेल किया था ,आज उसी तरह अपनी पसंद की चीज़ के लिए मैंने भी, पापा को ब्लैकमेल किया था , और तभी ये भी  अब मुझे समझ में आ गया की ,मेरी माँ भी मुझे पाने के लिए बहुत  परेशान  थी इसीलिए उसने ऐसा कहा था ,और वो  वो कोई बुरी औरत या विलन नहीं थी ये समझ में आते ही मैं बहुत खुश हुयी मुझे  खोयी हुयी माँ मिल गयी थी , और फिर मैं अपनी माँ के नजदीक आ गयी , मैं समझ गयी की वो कोई खलनायिका नहीं है ,बस मुझे पाने के लिए उसने ऐसा बोला, मेरे दोनों माता- पिता मुझसे प्यार करते है ,और मैं ग्रेट पेरेंट्स की प्यारी बेटी हूँ जो अलग होने के बाद भी मेरी इज़्ज़त करते है और मुझे खुश देखना चाहते है।
तो दोस्तों इस कहानी से आप उस झटके से बाहर आ सकते है,जो हमे माता- पिता के तलाक़  लेने से लगता है,
आप समझ जायेंगे की भले ही वो दोनों एक दूसरे के साथ खुश न हो और कोई दूसरे रस्ते चुन ले ,पर आप के दोनों माता पिता आपको बहुत प्यार करते है, और फिर आप दोनों की परिस्थितियों को समझ के दोनों के साथ आराम से रह सकते है.


































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