Saturday, 25 May 2019



पहचान 


मेरे माता पिता मेरे भाई को मुझसे ज्यादा प्यार करते है। 
मेरे प्यारे दोस्तों, मेरा या अनुभव शायद आपको अजीब लगे ,पर ये अनुभव मेरे लिए  लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्यूंकि इसके दवारा ही मुझे  जिंदगी में रिश्तो की पहचान करना आया है , अपनी कमजोरी का ज्ञान हुआ है ,
और खुद को समझने का मौका भी मिला है।
ये बात उस समय की है जब मैं मात्र 7  साल की थी ,  माँ ने बताया की वो मेरे लिए एक भाई लानेवाली है, क्यूंकि मैं  अकेली हूँ , और मेरी देखभाल और सबसे रक्षा करने के लिए मुझे एक वीर पुरुष चाहिए , वो मेरा रक्षक  ताउम्र के ले लिए  सिर्फ मेरा होगा और मुझे , मेरे भाई के रूप में मिलेगा , जो मेरी हर बात मानेगा , मैं  बहुत खुश हो गयी , और अपनी हर उस सहेली के बारे में सोचने लगी जो अपने घर में आराम से अपने भाई  के साथ खेलती थी , और जिन्हे किसी दोस्त की जरुरत नहीं थी , मैं बस अपने भाई के आने का इंतज़ार करने लगी , और फिर धीरे धीरे वह समय भी आ गया जब मेरा भाई इस दुनिया में आ गया..
माँ हॉस्पिटल में थी ,पापा बहुत खुश थे दादी, चाचा, चाची और मेरे सभी जानने पहचान ने  वाले लोग भी  बहुत खुश थे , भाई के आने की पार्टी मांगी जा रही थी , और मैं  समझ नहीं पा रही मेरे भाई के आने से भला इन्हे इतनी ख़ुशी क्यों है ? किसी को मेरा ख्याल भी नहीं था दादी ,पापा,चाचा सब मेरे भाई को घर में कहा रखना है ,उसके लिए क्या क्या चाहिए ?सब इसी सोच में थे , आज किसी को रोज़ की तरह ना मेरे खाने का और न ही, मेरे  टिफ़िन , मेरे  स्कूल कि कोई चिंता  थी , जैसे मैं हूँ ही नहीं ,
 वैसे तो मुझे स्कूल से छुट्टी लेने पर मेरे माता पिता बहुत नाराज़ होते , पर आज  पापा आये और बिना मेरी तरफ देखे बोले , तुम आज छुट्टी ले कर घर में ही रहो , मुझे भाई के पास जाना है , और माँ को घर लाना है , मैंने सर हिलाया , पापा ने मेरे से कुछ भी नहीं पूछा की , मैंने कुछ खाया या नहीं मैं क्यों उदास हूँ ? ये सोचंने का भी किसी को समय नहीं था, और मैं सोच रही थी की की माँ ने ये कैसा भाई मुझे दिया है ,जिसके आते ही सब मुझे भूल कर उसी  की चिंता में लग गए थे। ना जाने क्यों मुझे भाई का आना अचछा नहीं लगा। शाम को माँ भाई को ले के आ गयी , मैं सब भूल के बहुत खुश हो गयी और उसके छोटे- छोटे हाथ पैर सब कुछ देख कर मुझे लगा शायद , ये भी कोई माँ- पापा का लाया कोई खिलौना है , जिसे मैं जैसे चाहो खेल सकती हूँ  , आखिर इससे पहले भी तो सब कुछ मेरे लिए ही तो लाते थे , मैंने अपने भाई का हाथ पकड़ लिया की माँ ज़ोर से चिल्लाई ,अरे दूर रहो उससे  , छूना नहीं पहले हाथ धो कर आओ , मैं हैरान हो गयी और माँ के पास जाने लगी ,सब चिल्लाये दूर रहो माँ के पास मत जाना , माँ का ओपरेशन हुआ है , मैं दूर  बैठ गयी , और देखने लगी सब उस भाई को ही प्यार कर रहे थे माँ भी मुझे भूल गयी थी , पापा शाम  को भाई के लिए पालना लाये , और मेरे लिए कुछ भी नहीं बस मेरे पास आ कर बोले अब खुश हो ना भाई आ गया। मैं कुछ भी ना बोल पायी और , मुझे भाई के आने में ख़ुशी की कोई वजह भी नज़र ना आयी , इसी तरह 2 साल बीत गए और वो भी चलने लगा , और फिर धीरे -धीरे स्कूल भी जाने लगा , वैसे तो वो बहुत ही प्यारा और छोटा सा बच्चा था पर ,  मुझे बिलकुल भी पसंद नहीं आता , माँ उसे मेरी हर चीज़ दे देती , और अब मेरी जगह माँ के पास भी वही सोता था , उसे कोई नहीं डाँटता वो मेरी हर चीज़ खराब करता , और अगर मैं उसे ज़रा भी छूती तो सब मुझे डाँटने लगते , भाई को ले माँ पापा ज़्यदातर हॉस्पिटल के चक्कर ही  काटते रहते ,ना उन्हें मेरी parents meet याद रहती ना ही annual day ,.
भाई अब 6 साल का हो गया था ,वो मेरे पास आने की या मुझसे बात करने की कोशिश करता, पर मुझे वो बिलकुल भी पसंद ना था ,  क्यूंकि उसकी वजह से मेरे माँ पापा सब मुझसे दूर हो गए थे , पर मेरे चेहरे पर आये गुस्से को देख बस दूर से मुझे देखता। ,
पापा और माँ ने निर्णय लिया की भाई की देखभाल के कारण वो मुझे समय नहीं दे पा  रहे  है ,इसलिए मुझे हॉस्टल में डाल देना चाहिए , मुझे पूरा विश्वास था की क्यूंकि , मेरे माता पिता मुझसे ज्यादा मेरे भाई को प्यार करते है और दूसरे मैं लड़की हूँ इसलिए ,मेरे माता पिता मेरे साथ ऐसा व्यवहार कर रहे है , मेरी माँ जो मुझसे कभी दूर नहीं होना चाहती थी , ने मेरे लाख मिन्नतें करने पर भी मुझे हॉस्टल भेज दिया। , माँ पापा कभी मुझसे मिलने नहीं आये मैं ही छुट्टियों में घर आती , और माँ पापा को भाई को ले कर हॉस्पिटल के चककर लगते देखा करती ,मेरा 15वा  जन्मदिन आ रहा था , पापा ने मुझसे वादा  किया था की , वो मुझे लेडीज साइकिल ला कर देंगे , मैं बहुत खुश  थी ,पर जन्मदिन की सुबह ही माँ ने कहा की दो दिन बाद भाई का ओप्रशन है ,क्यूंकि उसके दिल में छेद है , इसलिए इस जन्मदिन पर मेरी साइकिल नहीं आ पायेगी।
मैं बहुत रोई पर मैंने देखा की मेरा भाई चुपचाप मुझे देख रहा है , मैंने भाई के ओप्रशन के बारे में कुछ भी नहीं पूछा , मैंने अगले दिन ही जाने का फैसला कर लिया , माँ बोली भाई के ओप्रशन के लिए रुक जाओ , तो मैंने गुस्से और नफरत से कहा मेरा कोई भाई नहीं है , मुझे कोई भाई नहीं चाहिए मैं कल चली जाउंगी , मेरा भाई तब भी मुझे देख रहा था , मेरी नफरत ने उसे कभी मेरे पास नहीं आने दिया , सुबह होते ही मैं हॉस्टल वापस चली गयी.
  हॉस्टल पहुंच कर जब मैंने अपना बैग देखा तो उसमे एक पत्र था , मेरे छोटे   भाई का पत्र , मैं हैरान हो गयी , उसमे लिखा था:
 "प्यारी दीदी , मेरे कारण आपको बड़ा दुःख हुआ ,पर दीदी मैं आपको बहुत प्यार करता  हूँ ,और आपको  इतना उदास नहीं देख सकता , मैं आपको हमेशा खुश रखने के लिए स्वस्थ होना चाहता हूँ , मुझे ओप्रशन से बहुत डर लगता है , डॉक्टर अंकल ने कहा की , जन्म से ही मेरे दिल में छेद है , अगर मैं ओप्रशन करवा लू तो आपको हमेशा खुश रख सकूंगा , दीदी मैं ओप्रशन के लिए त्यार हूँ ,पर अगर मैं वापस घर ना आ सका ,तो आपको ये कैसे पता चलेगा की , मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ , और हाँ मैंने आपके कमरे में आपके लिए एक तोहफा भी रखा है , शायद आपको पसंद आये , दीदी ये मेरे 7 जन्मदिनों तक बचाये  हुए पैसो से खरीदा है , मुझे पता है आप मुझसे नराज़  है ,  पर इसे जरूर स्वीकार कीजियेगा ,.
आपका भाई।
दोस्तों , मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था ,ऐसा कैसे हो सकता था , मैं इतनी स्वार्थी कैसे हो सकती थी , माँ पापा का दुःख भाई की तकलीफ मुझे किसी का भी एहसास नहीं था उफ़ !की मुझे अपने परिवार में हो रही इतनी बड़ी घटना के बारे में भी नहीं पता , मैं  अगली बस से ही घर पहुंची भाई हॉस्पिटल में मौत से खेल रहा था , माँ पापा का बुरा हाल था , जब मैंने भाई का कमरा खुला थो वह वही साइकिल थी, जिसे मैं लेना चाहती थी,साइकिल पे लिखा था मेरी दीदी के लिए हुए बड़ा सा  SORRY भी । मैं उस  साइकिल से चिपक कर बहुत रोई मुझे बस मेरा भाई चाहिए था।
मैं हॉस्पिटल पहुंची भाई ICU था अभी होश नहीं आया था मैं बस रोये जा रही थी आज मुझे माँ ,पापा, साइकिल ,खाना ,खिलोने कुछ भी नहीं चाहिए था बस मुझे मेरा भाई चाहिए था।
कुछ देर बाद भाई होश में आ गया मैं उसे देखने अंदर गयी पहली बार भाई को ध्यान से देखा बिलकुल मेरा ही प्रतिरूप, उसके  चारो तरफ TUBE  लगे हुए थे , और वो मेरी तरफ देख रहा था उदास आँखों से , मैंने उसके हाथ को पकड़ लिया , और रो पड़ी मुझे मेरा भाई मिल गया था , और वो उस दर्द में भी मुस्कुरा उठा ,जल्दी ही हम लोग भाई को ले कर घर वापस आ गये ,दोस्तों, आज  माता पिता का  ही नहीं , मेरा भाई मेरी भी जिंदगी है ,और मैं समझ गयी हु की माता पिता हर बच्चे को सामान प्यार करते है। माता पिता ने मुझे उस  दुःख से मुझे दूर करने के लिए हॉस्टल भेजा था, आज मैं मेरे माता पिता और मेरा भाई इन सभी से अपने  रिश्तो की गंभीरता को जान गयी हूँ।









विराम                                                                                                                
नमस्ते दोस्तों  मैं समीरा हूँ , मैं यहाँ आपको अपनी जिंदगी के अनुभवों से कुछ सिखाना चाहती हूँ, मेरी कहानी बहुत ही उदासी और मानसिक मंथन से बनी कहानी है , वैसे ये इतना जरूरी नहीं की मैं अपनी जिंदगी की इतनी व्यक्तिगत बात को सब को बताऊ , पर मुझे लगता है की मेरे ये अनुभव, मेरे उन दोस्तों को काम आएंगे जो इसी तरह के हालात से गुज़र रहे है.
तो मैं अपनी कहानी शुरू करती हूँ, आज से लगभग पच्चीस साल पहले मेरे माता- पिता का विवाह हुआ ,वे दोनों ही एकदूसरे को बहुत प्यार करते थे ,यहाँ तक की  लोग उन्हें made for each other  कहा करते थे।
मेरे पिता एक बड़े बिज़नेस मैन थे ,  वे बड़े ही दयालु और सभ्य व्यक्ति थे , उनके चेहरे पर सदैव एक मधुर  मुस्कान रहा करती थी , जो किसी को भी सहज अपनी तरफ खींच सकती थी.
दूसरी तरफ मेरी माँ पूरी  तरह से विपरीत थी ,वे बहुत ही दबंग और खुले दिल की स्त्री थी , वो किसी को सहज ही इज़्ज़त नहीं देती थी , आपसी बोलचाल में भी असभ्य और रूखे शब्दों का इस्तेमाल करती थी ,जहा मेरे पिता मुस्कुरा कर काम चला लेते , वहाँ वे  बिलकुल ही उलटी तौर पर  ज़ोर -ज़ोर से ठहाके लगा कर हॅसनेवाली और तरह -तरह के सकैण्डल  मैं  घिरी रहनेवाली महिला थी।
उन दोनों के बीच सिर्फ एक चीज़ थी जो समान थी , वह  थी मैं उन दोनों  की एकलौती संतान , वह दोनों ही मुझे बहुत प्यार करते और मैं भी उन दोनों को बहुत प्यार करती थी , लेकिन मेरा भी सभी सामान्य बच्चो की तरह माँ से कुछ ज्यादा ही जुड़ाव था  ,क्यूंकि जब भी कोई मेरे से यह बचकाना प्रश्न  जिसे हर बच्चे से पूछा जाता है की मैं किसे ज्यादा प्यार करती हूँ ? मैं बिना एक पल भी गवाए और कुछ भी सोचे बिना गर्व से कहती मां !.पर इसका मतलब ये बिलकुल नहीं था की मैं अपने पिता के करीब नहीं थी।
मेरे 15 वे जन्मदिन के समय मैं बहुत ही खुश थी, सब कुछ बिलकुल सामान्य सा ही था की, मेरे मेरे माता -पिता ने मुझे बात करने के लिए बुलाया , और कहा की वह मुझसे कोई जरुरी बात करना चाहते है , मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा और मैं खुद को बहुत कमज़ोर महसूस करने लगी , मेरे मन में अनजानी सैकड़ो शंकाये आने लगी, पसीना भी आने लगा, पर मेरे माता पिता का ज़रा सा  ध्यान भी मेरी तरफ नहीं था , मुझे वो दोनों ही बहुत अजनबी से लग रहे थे की ,तभी मैंने वो सुना जिसका मुझे डर था, और जो  किसी भी बच्चे के लिए असहनीय है
उन्होंने कहा:" सुनो बेटी हम दोनों ने निर्णय लिया है की हम दोनों अब अलग हो जाए , अब तुम भी बड़ी हो चुकी हो और अपना भला बुरा समझ के अपने फैसले ले सकती हो ,हमे पूरा विश्वास है की तुम समझ सकोगी ,
मेरे हाथ पैर काँप रहे थे मेरा दिमाग सुन्न हो गया था और तेज़ पसीना आ रहा था पर ,मैंने समझदार होने का नाटक करते हुए अपने सर को हिला दिया , और उन दोनों से ये प्रश्न भी नहीं पूछा की उनको मुझसे मेरे माँ बाप को अलग करने का ये अधिकार किसने दिया , मैं सोचने लगी की इतने दिनों तक हम सब एक दूसरे के साथ ही थे फिर भी मैं कैसे नहीं समझ पायी की मेरा परिवार इस तरह टूटने की कगार पर खड़ा है ,अचानक ही घर की खुशियों का इंद्रधनुष खतरनाक तूफान में बदल गया। घर की हंसी की जगह ख़ामोशी और षडयंत्रो ने ले ली।
तलाक़ की प्रक्रिया न्याय के अनुसार ही हुयी माँ पापा बिना किसी लड़ाई झगड़े के चुप चाप अलग हो गए सब कुछ बराबर बराबर बाँट दिया गया ,पर जो नहीं बंट पाया ,वो थी मैं जिसे उन दोनों में से कोई भी छोड़ना नहीं चाहता था , माँ पापा दोनों ही मुझे खुश रखने की कोशिशों में लग गए ताकि मैं उनकी तरफ आने का मन बना लू ,जो मुझे मेरे पहले माँ पापा जैसा नहीं लगता था ,ऐसा लगता उनका प्यार और उपहार सिर्फ मुझे साथ रखने के लिए लुभाने की कोशिशे है ,
 मेरी इस दुविधा को देख मेरे दादा दादी ने कहा “प्यारी समीरा तुम एक समझदार लड़की हो और बड़ी भी तुम माँ पा के बीच किसी एक को चुन लो और ख़ुशी से रहो। “
मेरा मन मुझसे कहने लगा की मैं ज़ोर ज़ोर से चिल्लाऊं और  पुछु :
“माँ पापा मैं कोई चीज़ नहीं आपकी अपनी वही समीरा हूँ ,एक जीती जगती बच्ची ,अपने मुझसे एक बार पूछा तो होता भला आप दोनों मेसे एक मैं कैसे चुन सकुंगी ,,क्या सच मच मैं इतनी बड़ी हूँ की मैं माँ या पापा के बीच किसी एक को चुन सकती हूँ ,”
हमारा घर एक नर्क में बदल चूका था जहा हम अब भी साथ ही रहते थे मैंने देखा ,मेरी माँ मुझे साथ रखने के लिए कुछ भी करने को तैयार है ,माँ मुझे तरह -तरह के महंगे उपहार  खरीद कर देती ,मुझे बहुत ही अजीब लगता की जो माँ मुझे हर चीज़ से रोकती और अच्छा बुरा समझती रहती ,आज बस मुझे आकर्षित करने के लिए माँ मुझे अपने साथ ब्यूटी स्पा ,रेस्टोरंट पब सब जगह साथ ले जाती और मेरे साथ माँ नहीं बल्कि बेस्ट फ्रेंड होने की एक्टिंग करती ,मेरी माँ कही खो गयी थी , मुझे अच्छा नहीं लगता ,मगर फिर भी मैं कुछ नहीं बोलती पर ,जो बात मुझे बिलकुल पसंद नहीं थी वह यह की, वो हर समय कहती मेरे पापा एक अच्छे इंसान नहीं है,मैं अपने पापा को बहुत प्यार करती हूँ ,मेरी माँ ही बार बार मुझे मेरे पिता के बुरे होने की खबर देती ,
दूसरी तरफ मेरे पिता कुछ भी नहीं कहते वो हमेशा  मेरी तरफ प्राथ्नापूर्ण नज़रो से देखते रहते और बहुत अकेले नज़र आते ,और मुझे अपने पिता का ये प्यार और बेबसी भी एक्टिंग सी लगने लगी थी ।
एक दिन मैंने उन दोनों को बात करते हुए सुना  मेरी माँ मेरे पिता को बड़े ही कड़े शब्दों में धमकी दे रही थी और ब्लैकमेल कर रही थी उन्होंने पिता जी से कहा " तुम समीरा को स्वतंर छोड़ दो तो मैं कोर्ट की इजाजत  से कभी -कभी तुम्हे  समीरा को देखने दूंगी वरना  सारी  उम्र तुम उसे नहीं  देख पाओगे ,मैं तुम्हारे ऊपर हिंसक होने का आरोप लगा दूंगी और तुम्हारे ऊपर एक खराब हिंसक और बुरे आदमी होने का आरोप लगवा दूगी और लीगली भी  उसको कभी  देखने  नहीं दूंगी , वैसे भी तुम जानते हो वो सिर्फ मुझे ही चुनेगीं।"
मेरे पापा बहुत उदास हो गए और कुछ नहीं बोले उन्होंने सर हिला दिया वह कैसे भी सिर्फ मुझे देखना चाहते थे, माँ का ये रूप देख कर मुझे बड़ा  बहुत दुःख हुआ और मैं बहुत रोई और मैंने उसी समय अपना निर्णय भी ले लिया। अगले दिन कोर्ट में जब माँ पुरे विश्वास से मुझे लेने आयी ,मैंने कोर्ट में कहा की, मैं सिर्फ अपने पिता के साथ रहना चाहती हूँ.
 मेरी माँ के  चेहरे का  दुःख और अपमान से  रंग उड़ गया  और वो मेरी तरफ घृणा से देखने लगी ,मेरे पापा की ख़ुशी और आश्चर्य  का कोई ठिकाना ही ना था ,वो सबको धन्यवाद दे कर ख़ुशी से रो पड़े।
अब  माँ ने हमारा घर छोड़ दिया था और मैं पापा के साथ रहने लगी , मेरे मन में माँ के बारे में बहुत बुरे- बुरे ख्याल आते ,और उनकी मेरे पिता से कही गयी बाते भी हमेशा दिमाग मैं घूमती,  मैं अपनी माँ से ,दिल से  दूर होती जा रही थी, वो मुझे किसी खतरनाक विलेन की तरह नज़र आती , माँ मुझसे कभी -कभी मिलने आती थी और हमेशा  मुझे जताती की मैं कितनी बड़ी स्वार्थी  और दगाबाज़ हूँ , मुझे समझ नहीं आता की उन्हें कैसे समझाऊ की मैं नहीं वही ऐसी हैं पर मैं  चुप रहती ,दूसरी तरफ मेरे पापा बहुत खुश है, हमेशा मेरी इच्छा  का ध्यान रखते है मुझे समय देते है अच्छे बुरे का ज्ञान देते  है मेरे लिए गिफ्ट लाते है, और सब से बड़ी बात उन्होंने  मुझे ढेर सा फ्रीडम भी दिया जो किसी भी पंद्रह साल की लड़की को मिलना संभव नहीं है।
पर एक बार मैंने ,इस फ्रीडम को दुरूपयोग करने का सोचा और पापा से कहा की   एक ओवर नाईट म्यूजिक पार्टी  है ,जिसमे मैं अपने मित्रो के साथ पूरी रात बाहर बिताना चाहती हूँ ,  पर मेरे पापा नहीं माने  ,मैं बहुत  चीखी ,चिल्लाई और जब कोई नतीजा  नहीं निकला तो मैंने वो किया जो मैं  सोच भी नहीं सकती थी , मैंने पहली बार अपने  पापा को ब्लैक मेल किया , और मैं बोली की अगर आपने मुझे परमिशन नहीं दी, तो मैं तुरंत माँ को फ़ोन कर माँ के पास  चली जाउंगी, पापा के फेस पर फिर मायूसी  के भाव आ गए, और वो बोले ठीक है , तुम जाओ ,जो ठीक लगे करो, और चुप चाप मेरे कमरे से चले गए।
और मैं सोचने लगी की मैंने, उनको कितना बड़ा शॉक दिया है, मैंने अपने डैड को ब्लैकमेल किया था, और मुझे बहुत शर्मिंदगी लग रही थी, जिस तरह मेरी माँ ने उस शाम पापा को ब्लैकमेल किया था ,आज उसी तरह अपनी पसंद की चीज़ के लिए मैंने भी, पापा को ब्लैकमेल किया था , और तभी ये भी  अब मुझे समझ में आ गया की ,मेरी माँ भी मुझे पाने के लिए बहुत  परेशान  थी इसीलिए उसने ऐसा कहा था ,और वो  वो कोई बुरी औरत या विलन नहीं थी ये समझ में आते ही मैं बहुत खुश हुयी मुझे  खोयी हुयी माँ मिल गयी थी , और फिर मैं अपनी माँ के नजदीक आ गयी , मैं समझ गयी की वो कोई खलनायिका नहीं है ,बस मुझे पाने के लिए उसने ऐसा बोला, मेरे दोनों माता- पिता मुझसे प्यार करते है ,और मैं ग्रेट पेरेंट्स की प्यारी बेटी हूँ जो अलग होने के बाद भी मेरी इज़्ज़त करते है और मुझे खुश देखना चाहते है।
तो दोस्तों इस कहानी से आप उस झटके से बाहर आ सकते है,जो हमे माता- पिता के तलाक़  लेने से लगता है,
आप समझ जायेंगे की भले ही वो दोनों एक दूसरे के साथ खुश न हो और कोई दूसरे रस्ते चुन ले ,पर आप के दोनों माता पिता आपको बहुत प्यार करते है, और फिर आप दोनों की परिस्थितियों को समझ के दोनों के साथ आराम से रह सकते है.


































नमस्ते दोस्तों मेरा नाम सुमिता है ,और मेरे पिता शराबी है , नहीं ये मत सोचिये की मैं यहाँ आपके साथ कोई शराब पी कर मार पीट करने वाली कहानी और अनुभव बाटना चाहती हु , नहीं दोस्तों मेरी कहानी इन सबसे  अलग और अनोखी है , मैंने अपने जीवन में अपने पिता से अच्छा और प्यार करने वाला व्यक्ति नहीं देखा  है , वो एक बहुत ही ख्याल रखने वाले और परिवार के लिए ही जीने वाले व्यक्ति हैं , और शायद परिवार के लिए इतना सेंसटिव होना ही उनके alcohalic  होने का कारण है।
दोस्तों बारह साल तक सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था , मेरे माता पिता दोनों ही मुझे बहुत प्यार करते थे ,मैं अपने आपको संसार की सबसे खुश नसीब लड़की समझती थी ,मेरे सोचने से पहले ही मेरे माता पिता मेरी इच्छाओ को पूरा कर देते थे , मेरी माँ


 बहुत ही खूबसूरत और energetic महिला थी , और पिता सीधे साधे  और शांत ,सब कुछ अच्छा था की एक शाम माँ ने आ कर कहा की उनको उनके लिए कोई और मिल गया है , और वो उसके साथ हमेशा के लिए जा रही है और वो किसी दूसरे शहर में उसके साथ रहेंगी
फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर कहा सुमिता मैं कोई कोर्ट केस नहीं करना चाहती क्यूंकि मुझे पता है की तुम्हारे डैड से ज्यादा अच्छी तरह से तुंहारी देखभाल कोई नहीं करेगा,और फिर उन्हें तुम्हारी जरुरत भी होगी ,मैं तुमसे मिलने आती रहूंगी ,तुम यही दादी के साथ रहो ,क्यूंकि यही सबके लिए ठीक होगा ,
आपको लगता है की मैं आपको, बस यही बताना चाहती हूँ की मेरी खुद की माँ ने मुझे धोखा दिया है,वह कैसे ये वदेसीडे कर सकती है ,एक माँ अपने बच्चे को कैसे छोड़ सकती है ,मैं कैसे समझू की मेरी माँ मुझे पसंद नहीं करती,पर मुझे खुद को ये समझाना ही था की मेरी माँ मुझे पसंद नहीं करती,
दूसरी तरफ मेरे बेचारे डैड वह बहुत ही डिप्रेस्ड थे ,हर समय उड़स और दुखी रहते हसना तो जैसे वो भूल ही गए थे ,कितना मुश्किल होता होगा उन्हें खुद को समझाना की जिस पत्नी को वो इतना प्यार करते थे वो बिना कारण उन्हें छोड़  के किसी और के साथ गर्व से चली गयी ,
उन्होंने रोज़ शाम को वोडका के दो छोटे पैग  मुझ से इज़ाज़त ले  के पिने शुरू किये ,उन्होंने कहा ,बेटी मुझे मत रोको मुझे थोड़ी हिम्मत मिलती है ,मुझे पता था मेरे डैड माँ को बहुत प्यार करते थे ,सो मैं उन्हें मना ना कर सकी ,और शायद यही मेरी बड़ी भूल थी ,मेरे डैड की एक ही कमज़ोरी थी वह बहुत स्ट्रांग महस्थिति के स्वामी नहीं थे ,और मैं ऐ ये सब समझने के लिए बहुत छोटी थी , जबतक मेरी समझ में आये बहुत देर हो गयी थी डैड के दो पैग दो से चार चार से आठ और आठ से सोलह बन गए थे ,वो पीते पीते आराम कुर्सी पर ही सो जाते थे और मैं उन्हें किसी तरह बीएड तक पहुँचती थी ,पर अब उनका पीना उनके काम पर भी असर करने लगा था ,मैंने उन्हें समझाया की डैड आप खुद को इतना अकेला और कमज़ोर ना समझिये और अगर आपको प्रॉब्लम है तो कोई मेडिसिन ले लीजिये और सो जाइये इतना पीना ठीक नहीं ,तो उन्होंने हामी में सर हिलाया और मुझे लगा की अब वो depresion  से बहार आ जायेंगे ,पर अब स्थिति और भी बदतर हो गयी वो मुझ से डरने लगे और घर के बदले बाहर पीने लगे
इतना ही नहीं उन्हें बहार कुछ सस्ते बार और नीच किस्म के दोस्त भी मिल गए जो दिन भर मेरे पिता के पैसो से पीते और उन्हें बहुत बेचारा महसूस कराते।
वो मुझसे से रोज़ प्रॉमिस करते की वो अब नहीं पिएंगे पर वो उन्हें पूरा नहीं कर पाते वो रट गिड़गिड़ाते मुझसे माफ़ी मांगते पर अगले दिन फिर वही होता , स्थिति पहले से भी खराब हो गयी थी वो इतना पी लेते थे की ,अब वो लड़खड़ाते हुए या घुटनो के बल घर में आते थे, कभी कभी घर आना भी भूल जाते तब मैं उन्हें ढूंढ  कर घर लाती ,कभी उनके चहरे पर इधर उधर गिरने के कारण हुए जख्म के निशान होते ,पर वो आज भी पहले जैसे ही थे मुझे प्यार करतये माफ़ी मांगते और सो जाते।
मेरे पिता जहा होते उनको वहां  से लाना मुझ जैसी  किशोर लड़की के लिए कोई साधरण बात नहीं थी ,कई बार मैं अपने साथ बात ले के जाती ,उनके दोस्त मुझसे डरते थे ,
मई खुद को बहदुर दिखने की बहुत कोशिश करती पर मेरे जैसी लड़की के लिए भी ये बहुत मुश्किल था,
एक बार जब डैड नहीं आये तो मैं उन्हें ढूढ़ने गयी ,डैड एक बार में थे और एक लम्बा छोड़ा आदमी उन्हें मार कर पैसे मान रहा था डैड पूरी तरफ बेहोश थे ,मैंने उस आदमी का हाथ पकड़ लिया और कहा मेरे पास पैसे नहीं है ,और जाने कैसे डैड को घर ले आयी , मेरे लिए ये मेरी उम्र और हिम्मत की सीमा से बहुत था, मैं अपनी जिंदगी इस तरह नहीं गुजार सकती थी ,इसलिए मैंने माँ के पा जाने का निर्णय लिया ,ये सुनते ही मेरे पिता मुझे एक बहुत ही डरे हुए और हारे हुए इंसान की तरह देखने लगे ,और मैं  ज़ोर ज़ोर से रोने लगी , मेरे डैड ने मुझे कभी रट हुए नहीं देखा था उन्होंने निर्णय किया की वो शराब को हाथ भी नहीं लगाएंगे ,उन्होंने अपनी साड़ी शराब की बोतले फेक दी और ऑफिस भी गए अगले दिन मेरा पन्द्रहवा जन्म,दिन था ,मैंने सोचा अब मैं कुछ दिन और डैड  के साथ रहूंगी,ओस दिन के बाद डैड ने कभी शराब को हाथ नहीं लगाया वो समय से ऑफिस जाते मेरे साथ समय बिताते और खुश रहते उनका विशवास वापस आ गया था ,वो हर समय मुझसे बीते वक़्त के लिए माफ़ी मांगते ,हमारी जिंदगी वापस आ गयी थी
 आज मैं एक डॉक्टर हूँ और मुझे ब्रेन सर्जरी के लिए अवार्ड भी मिला है और ये सब  मेरे डैडी के प्यार का नतीजा है ,मेरी हिम्मत ने मुझे मेरे पिता वापस दे दिए है।